“Prakriti humse naraaz hain…”

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V.K Verma from Giridi (Jharkhand) recites a poem on the importance of protecting nature and how our neglect to nature creates disasters and destruction.

प्रकृति हमसे नाराज है

देख कर भी उत्तराखंड जैसी तबाही,
इसका शिकार हुए लोग जब दी गयी इसकी गवाही,
पर फिर बात क्यों नहीं आयी समझ में हमारी,
कि जैसा स्तिथि कल था वो नहीं आज है,
क्योंकि ऐसा लगता है,
जैसे प्रकृति हमसे नाराज़ है,
प्रकृति हमसे नाराज है,
क्यों नहीं सोचते है लोग,
इसके समाधान के बारे में,
पता नहीं कैसा हमारा समाज है,
हमें पता है जब,
जैसी स्तिथि कल था वो नहीं आज है,
क्योंकि
प्रकृति हमसे नाराज़ है,
प्रकृति हमसे नाराज़ है,
देख रहे है सामने हम भयंकर सूखा,
ये अहसाह तब होगा,
जब पूरा परिवार सोयेगा भूखा,
फिर भी लोग अनजान बने हुए है,
जैसे कोई राग है,
जैसे कोइ राग है,
तनिक भी नहीं सोचते है,
अपने बारे में,
कि कैसा हमारा साम्राज्य है,
और भी पता नहीं क्या हो सकता है
क्या नहीं हो सकता है,
जब प्रकृति ही हमसे नाराज है,
प्रकृति ही हमसे नाराज है,
चलो चल कर प्रकृति को मानाने का प्रयास करें,
उसके दुःख दर्द और गमो का एहसास करें,
हमें पता है जब
कि पेड़ पौधे लगन और उसकी रक्षा करना ही
प्रकृति को मानाने के आगाज है,
पर भी हमें क्यों समझ में नहीं आता
कि जैसी स्तिथि कल था वो नहीं आज है,
चलो चल कर मनाएं
जब हमारी प्रकृति हमसे नाराज है
प्रकृति हमसे नाराज है
इससे आगे मई क्या कहूं
मेरे पास नहीं अल्फाज़ है
नहीं अल्फाज़ है,

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